क्या लालू परिवार जायेगा जेल? लालू यादव के परिवार पर IRCTC केस में कोर्ट ने किया आरोप तय! लालू यादव व उनके परिवार के साथ आगे क्या होगा? आरोप तय हो जानें का कानूनी मतलब क्या है?

लालू परिवार पर आरोप तय! कोर्ट ने दिया अपना फैसला! लालू यादव केस में अब आगे क्या होगा? जाने आरोप तय होने का कानूनी मतलब…

विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने लालू यादव को कहा कि आपने षड्यंत्र रचा, आपने लोक सेवक के रूप में अपने पद का दुरुपयोग किया, टेंडर प्रोसेसिंग में दखल दिया, और टेंडर हासिल करने की शर्तों में हेराफेरी की गई।

कोर्ट ने लालू यादव को कहा कि आपने कोचर से ज़मीन के टुकड़ों की कम कीमत पर खरीद की साजिश रची, और बाद में इन जमीनों पर प्रभावी नियंत्रण राबड़ी और तेजस्वी को हस्तांतरित करने के लिए अन्य आरोपियों के साथ मिलकर साजिश रची गई।

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट से लैंड फॉर जॉब स्कैम मामले में लालू परिवार को बड़ा झटका लगा है. राउज एवेन्यू की सीबीआई अदालत ने लालू यादव, राबड़ी देवी और उनके बेटे तेजस्वी यादव के खिलाफ आरोप तय कर दिए हैं. इन लोगों पर IPC 420, IPC 120B, प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 13(2) और 13 (1)(d) के तहत मुकदमा चलाया जाएगा. ऐसे में बहुत से लोग यह जानना चाहते हैं कि अदालत में आरोप तय होना क्या होता है, इसका कानूनी मतलब क्या है और अब लालू परिवार के साथ आगे क्या होगा?

अदालती जुबान में क्या है इसका मतलब?

अदालती जुबान में इसका साधारण और सीधा मतलब यह होता है कि किसी क्रिमिनल केस या भ्रष्टाचार के मामले में पुलिस या उचित जांच एजेंसी ने अपनी जांच पड़ताल पूरी कर ली है और उसने अपनी रिपोर्ट अदालत को सुपुर्द कर दी है. इसे आम भाषा में चार्जशीट फाइल करना भी कहते हैं. इसके आगे की कड़ी होती है फ्रेमिंग ऑफ चार्ज की. इस दौरान सुपुर्द की गई रिपोर्ट को जज देखता है, अपने विवेक से समझता और उस पर फैसला करता है. इस कड़ी में जज आरोपी को अदालत में पेश होने का आदेश जारी करता है. अदालत आरोपी से कहती है कि आपके खिलाफ ये-ये आरोप लगाए गए हैं, क्या आप इसे कबूल करते हैं? अगर मुल्जिम इसे कबूल कर लेता है तो फिर अदालत का काम सिर्फ आरोपी को सजा देने का रह जाता है.

अगर आरोपी इनकार कर दे तो?

अदालत जब आरोप तय करती है तो आरोपी को पूरा मौका दिया जाता है. अगर वह आरोप कबूल करने से इनकार कर देता है तो इसका सीधा मतलब होता है कि आरोपी ट्रायल फेस करना चाहता है, यानी अदालती कार्यवाही का सामना करना और अपना पक्ष भी रखना चाहता है. इसमें मौटे तौर पर चार स्टेज होते हैं. इसके बाद गवाही की प्रक्रिया शुरू होती है. सबसे पहले प्रोसेक्युशन(अभियोजन) पक्ष की गवाही होती है, उसके बाद डिफेन्स पक्ष की, फिर बहस और फैसला.

क्या धाराएं घट-बढ़ भी सकती हैं? 

इसी स्टेज पर आरोपी पर लगाए गए चार्ज पर बचाव पक्ष के वकील और अभियोजन पक्ष के वकील अपनी बात रखते हैं. जज को यदि लगता है कि जांच एजेंसी ने आरोप तय करने में बेईमानी की है तो वह फिर से जांच के भी आदेश दे सकता है और गलत धाराओं को हटा भी सकता है. वहीं, अगर पुलिस ने केस को हल्का किया है तो वह अलग से नई धाराओं को जुड़वा भी सकता है.

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