लखनऊ–कानपुर, लखनऊ-रायबरेली व मोहान-बनी हाईवे पर 70-80 साल से सार्वजनिक शौचालयों का अभाव: बुजुर्गों-महिलाओं, राहगीरों और मजदूरों की गरिमा से खिलवाड़, जिम्मेदार कौन?

लखनऊ–राजधानी लखनऊ के कानपुर रोड हाईवे पर अमौसी बाजार से उन्नाव सीमा स्थित साईं नदी तक फैले लंबे मार्ग पर एक भी सार्वजनिक शौचालय का न होना गंभीर जनसमस्या बन चुका है। यह वही मुख्य मार्ग है जहां थाना सरोजनीनगर, स्कूटर इंडिया चौराहा, गौरी बाजार, दरोगाखेड़ा, थाना बंथरा, बंथरा बाजार, मोहनलालगंज तिराहा, बनी बाजार और वस्त कस्बा जैसे अत्यंत व्यस्त क्षेत्र आते हैं, जहां से प्रतिदिन हजारों नागरिक और लाखों वाहन गुजरते हैं।

इस पूरे क्षेत्र में सार्वजनिक शौचालय की अनुपस्थिति को लेकर स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानव अधिकार संगठनों में गहरी नाराज़गी है। उनका कहना है कि यह केवल सुविधा का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव गरिमा और मौलिक अधिकारों का प्रश्न है, जिसका लंबे समय से उल्लंघन हो रहा है।

70–80 साल पुराना बाजार एक भी शौचालय नहीं, क्यो?

बंथरा बाजार पिछले 70–80 वर्षों से गल्ला मंडी और व्यापारिक केंद्र के रूप में जाना जाता है। जहां पहले खेतों के बीच मंडी लगती थी, वहीं आज उसी क्षेत्र में आधुनिक मकान, शॉपिंग मार्केट, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और गोदाम बन चुके हैं। सड़कें चौड़ी हो गईं, हाईवे आधुनिक बन गया, लेकिन सार्वजनिक शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा अब तक नहीं बनाई गई।

हजारों मजदूर, व्यापारी, महिलाएं, बुजुर्ग और राहगीर प्रतिदिन यहां आते हैं। सवाल यह है कि यदि किसी महिला, बुजुर्ग या बीमार व्यक्ति को शौचालय की आवश्यकता पड़े तो वह कहां जाए? खुले में शौच के लिए मजबूर होना न केवल अस्वच्छ है, बल्कि मानव गरिमा पर सीधा प्रहार है।

शासन-प्रशासन पर उठते है सीधे सवाल!

स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर पंचायत, नगर निगम, स्थानीय पार्षद, विधायक और सांसदों ने अब तक इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया। दो वर्षों से यह कहा जा रहा है कि बाजार शिफ्ट किया जाएगा और नई जगह पर शौचालय बनाए जाएंगे, लेकिन प्रस्तावित स्थान मुख्य मार्ग से लगभग एक किलोमीटर दूर है, जिससे हाईवे पर चलने वाले यात्रियों की समस्या का समाधान नहीं होता।

जब प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की योजनाओं के तहत गांव-गांव और घर-घर शौचालय बनाए जा रहे हैं,

स्वच्छ भारत मिशन को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं

तो फिर राजधानी के सबसे व्यस्त हाईवे और बाजारों में सार्वजनिक शौचालय क्यों नहीं?
इस लापरवाही की जिम्मेदारी कौन लेगा?

सौंदर्यीकरण या अतिक्रमण?

यह भी आरोप लगाया गया कि सौंदर्यीकरण और विकास के नाम पर सरकारी जमीनों पर दबंगों द्वारा दुकानें और मकान बना लिए गए, लेकिन जनसुविधाओं के लिए जगह और योजना दोनों ही नदारद हैं। पूरे बंथरा कस्बे और आसपास के बाजार क्षेत्रों में एक भी सार्वजनिक शौचालय का न होना प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है।

भारतीय मानवाधिकार सुरक्षा परिषद संगठन की मांग

मानवाधिकार संगठन और वरिष्ठ नागरिकों ने मांग की है कि

1. लखनऊ–कानपुर हाईवे,

2. लखनऊ–रायबरेली मार्ग,

3. बनी–मोहनलालगंज मार्ग

पर तत्काल सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण कराया जाए, ताकि आम नागरिकों, महिलाओं, मजदूरों और यात्रियों को उनका संवैधानिक अधिकार मिल सके।

अब देखना यह है कि क्षेत्रीय सांसद व विधायक और शासन-प्रशासन व जनप्रतिनिधि इस गंभीर जनसमस्या पर कब तक ठोस कार्रवाई करते हैं, या फिर जनता इसी तरह असुविधा और अपमान झेलने को मजबूर रहेगी।

सौजन्य से:- पी. के. पात्रा (वरिष्ठ नागरिक)
जिला महासचिव, भारतीय मानवाधिकार सुरक्षा परिषद

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